Sunday, 21 February 2010

अठन्नी सी ज़िन्दगी .....

आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने के लिए कलम उठाई तो समझ में नहीं आया कि क्या लिखूं, तो खिड़की पर जाके बैठ गयी। मेरे घर कि खिड़की से ज़िन्दगी के दो पहलू दिखते हैं। एक तरफ ऊंची असमान छूती तीस-पैंतीस मंजिला इमारतें और दूसरी तरफ कचरे के ढेर में फँसी, दूर-दूर तक फैली झोंपड़पट्टी, और इन दोनों के बीच में फँसी मैं और मेरे जैसे लाखों-करोडो लोग, मध्यमवर्गीय लोग। जिन्हें आप कौमन मैन यानि कि आम आदमी भी कह सकते हैं। कौन है ये आम आदमी? ये क्या करता है? क्यूँ करता है? किसके लिए करता है? ये आम आदमी वो प्राणी है जो टैक्स भरता है, कानून का पालन करता है, सरकार पर भरोसा करता है और डरता है, पुलिस से, नेताओं से, गुंडों से। यूँ तो वो ये सब इसलिए करता है, ताकि अपनी ज़िन्दगी शांति से बिता सके पर जब बाढ़ आती है, बम फटते हैं, महंगाई बढती है तो मरता ये ही है। जो बड़े बड़े बंगलों और ऊंची-ऊंची इमारतों में बैठे हैं वो जेबें भरते हैं नेताओं की ताकि नेता खुश रख सकें उन झोपड़ी में रहने वालो को (वोटों के लिए)। आम आदमी देखता है सब कुछ, चीखता है, चिल्लाता है और फिर चुपचाप वापस चला जाता है अपनी ज़िन्दगी में, बसों और ट्रेनों में धक्के खाने, नौकरी करने, टैक्स भरने, रोज़ तिल-तिल मरने और एक दिन एक धमाके के साथ भीड़ में गायब हो जाने के लिए।
गुलज़ार साहब के शब्दों में कहें तो उसकी अठन्नी सी आधी ज़िन्दगी कभी पूरा रुपया नहीं बन पाती।

6 comments:

  1. My mom dad were in the same play yesterday...They loved it too...

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  2. It's been years since I've read Hindi. Well written.

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  3. gr8... well perceived n translated.

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